"सेवा परमो धर्मः"
जब हम यह कहते हैं कि सेवा परम धर्म है तो यह मान लिया जाता है कि सेवा में पात्रता का ध्यान नहीं रखना चाहिये। हम विचार करते हैं तो हमें लगता है कि सेवा करते हुए भी हमें पात्रता का ध्यान रखना चाहिये। रामायण का उदाहरण है की रावण एक भिक्षुक व साधु के छद्म वेश में भिक्षा लेने आया था। माता सीता उस छद्म वेश भिक्षुक की सेवा हेतु उसे भोजन के पदार्थ दे रही थी। यह भिक्षा एक सेवा ही तो थी। यदि इसे परम धर्म कहा जाये तो इसका परिणाम देखना चाहिये। जिस कार्य के परिणाम से व्यक्तिगत, समाजिक व देश का अहित हो, वह कार्य अच्छा होने पर भी अच्छा न होकर परम धर्म तो क्या अधर्म ही कहा जा सकता है। अतः सेवा करनी चाहिये और सेवा करते हुए यह ध्यान रहना चाहिये कि हम जिसकी सेवा कर रहे हैं वह उसका पात्र हो। हमारी सेवा से वर्तमान व भविष्य में हमारा व हमारे बन्धुओं का किसी प्रकार से अनीष्ट न हो। सेवा लेने वाले की पात्रता में प्रथम आवश्यकता तो यही होती है कि वह व्यक्ति निर्दोष होना चाहिये। वह व्यक्ति अपराध प्रवृत्ति का न हो। यदि सेवा लेने वाला इन दोषों से युक्ता होगा तो सेवा का परिणाम गलत हो सकता है और तब सेवा करने वाले को पछताना पड़ सकता हैं ।